Lakhimpur Student Union Election
बात तब की है जब यह अजनबी शहर धीरे धीरे अपना सा हो रहा था । धड़कनों में बसता था ,वाई डी कालेज और राजगढ़ मुहल्ला ।डाक से भेजी जाने वाली चिट्ठियों में जयदेवनगर भी दर्ज होता था । यह नाम वाई डी कालेज के पहले यशस्वी प्रिन्सिपल के नाम परपड़ा था । हम कालेज गेट से बाहर दूसरी गली में तिवारी जी के मकान में पहली मंज़िल पर रहते थे । इन्हें हम बाबूजी कहते थे।
वाई डी कालेज में एक कहावत गहरे से इसकी फ़िज़ाओं में तैरती थी कि इस संस्था में तीन ही प्रमुख काम हैं-
एडमिशन , एलेक्शन , इग्ज़ैमिनेशन
तीनों ही काम ख़ासे चर्चा में रहते थे ।
आज बात एलेक्शन की । एलेक्शन यानि छात्रसंघ चुनाव ।
लोकतंत्र की इस पहली पाठशाला में छात्र क्या सही सीखते थे क्या ग़लत यह नहीं कहा जा सकता लेकिन थी तो पाठशाला ही । समयके साथ कालेज में छात्र नेताओं की भरमार हो गई । बाद में नित बिगड़ते स्वरूप के चलते मुख्यमंत्री मायावती के काल में और कानपुरविश्वविद्यालय से बैन होने पर छात्रसंघ चुनाव बंद हो गए । ये छात्र एडमिशन और विश्वविद्यालयी इग्ज़ैमिनेशन को भी प्रभावित करते थे, उसमें ख़ासा हस्तक्षेप और दबाव बनाते थे ।
बात कब की है सही सही याद नहीं लेकिन 1995 -97 के बीच की है । नामांकन का दिन था । कालेज हमेशा की तरह बांस बल्ली सेघेर दिया गया था । कालेज के प्राचार्य एम॰पी॰एस० चौहान जी थे । कालेज गेट पर सभी छात्र दलों के तम्बू लगे थे । नामांकन काअंतिम समय था दिन के ११ बजे तक । पुलिस , ज़िला प्रशासन , कालेज प्रशासन अपने अपने ड्यूटी पर तैनात थे । गाजे बाजे ढोल केसाथ टोलियाँ अपने अपने दल बल के साथ जा रही थीं ,पर्चा भरने । एक दल कुछ ज़्यादा ही मौज मस्ती में था ।इनको नाचते झूमते नामांकन स्थल पर पहुँचने में कुछ देर हो गई । बस क्या था दूसरे पक्ष ने प्रतिरोध शुरू कर दिया । दोनों ओर से खींचतान के बाद उन्हेंनामांकन करने से रोक दिया गया ।
छात्र नेताओं का ग़ुस्सा सातवें आसमान पर । थोड़ी देर में कालेज के अंदर से तेज धुआँ उठता दिखा , फ़ायरिंग की आवाज़ और भगदड़भी । सुनने में आया कि पुलिस की जिप्सी लड़कों ने आग लगा के फूँक दी ।
अब बारी थी ग़ुस्सा फूटने की ज़िला प्रशासन की । पूरा प्रशासन चप्पे चप्पे पर छात्रों की धर पकड़ में जुट गया । जो भी छात्र गलीमुहल्ले की घरों में भागे उन्हें दौड़ा दौड़ा कर घरों से खींचा जाने लगा , घसीटा जाने लगा । यह सब देख कर कलेजा मुँह को आने लगा ।इन्हें बचाने में लोगों की घिग्घी बंध गई । बच्चे भागे बस स्टेशन और रेलवे स्टेशनों की ओर । हर जगह छापेमारी । सत्रह अठारह सालके उम्र के बीच के लड़के पकड़े जाने लगे । शाम तक सबके अभिभावक अपने अपने वार्ड को छुड़ाने के लिए परेशान रहे ।
उस साल का एलेक्शन कैसिल हो गया । इस आँखों देखी घटना की भयावहता बहुत दिनों तक दिमाग़ पर चढ़ी रही जिसकी तस्वीर जब तब मन में तैर ही जाती है ।
लखीमपुर की पुरानी यादों का एक पन्ना
वाई डी कॉलेज का यह स्वरूप सिर्फ आपके इस लेख से पता चला। आपके द्वारा रचित इस शब्दचित्र ने मुझे 1995 के वाई डी कॉलेज के इस स्वरूप का भी प्रत्यक्ष दर्शन करा दिया । मैम कॉलेज से संबंधित और किस्से सुनने की हार्दिक इच्छा भी है और जिज्ञासा भी।🙏🏻
ReplyDeletethankyou .I will try
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